हमारे मौन मन से सत्यता की ध्वनि आती है और सुख दुख के मानसिक उद्गारो से अहंकार की ध्वनि आती है। मौन मन अर्थात् अन्त के करण जो मानवीय चैतन्यता का जनक है। मन में भावनाएं निवास करती है। यदि ईश्वर से संवाद करना हो तो मौन में टिकना पहला कदम है। मौन का यह वातावरण यदि अमृतवेले का हो तो ईश्वरीय प्रेरणाओ व सकेतो काक सहज रीति से ग्रहण करना किसी भी राजयोग के साधक के लिए आसान होते है।
