Thu. May 7th, 2026

हमारे मौन मन से सत्यता की ध्वनि आती है और सुख दुख के मानसिक उद्गारो से अहंकार की ध्वनि आती है। मौन मन अर्थात् अन्त के करण जो मानवीय चैतन्यता का जनक है। मन में भावनाएं निवास करती है। यदि ईश्वर से संवाद करना हो तो मौन में टिकना पहला कदम है। मौन का यह वातावरण यदि अमृतवेले का हो तो ईश्वरीय प्रेरणाओ व सकेतो काक सहज रीति से ग्रहण करना किसी भी राजयोग के साधक के लिए आसान होते है।

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