Thu. May 7th, 2026

विद्यार्थी जीवन में स्वामी रामतीर्थ को दूध बड़ा प्रिय लगता था। वे एक हलावाई के यहाँ रोजाना दूध पीया करते थे। एक बार पैसो की तंगी होने के कारण एक महीने के दूध के पैसे हलवाई को नही दे पाये। इसके कुछ ही दिन के पश्चात् उनकी लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन काँलेज में प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हुए और उन्हे नियमित वेतन मिलने लगा। फिर वे हर महीने हलवाई को उसके दूध के रुपये मनिआँर्डर से भेजने लगे। संयोग से हलवाई को लाहौर जाना पडा उसकी मुलाकात स्वामी जी से हुई। हलवाई हाथ जोडकर बोला गोसाई जी आपसे तो सिर्फ एक महीने के दूध पैसे आने थे। मगर आप मुझे पिछले सात महीनो से लगातार मनिआर्डर भेज रहे है। मैने आपके बाकी रुपए सम्भाल कर रखे हैं, आपको लौटा दूँगा किन्तु अब आप पैसे ना भेजा करे। स्वामी जी मुसकराये और कहा भैया मै तुम्हारा बहुत बड़ा आभारी हूँ। उस वक्त तुमने जो मुझ पर कृपा की उससे मेरा स्वास्थ्य बना रहा। तभी तो आज अच्छे से कार्य कर रहा हूँ। तुम्हारा यह कर्ज न तो अदा कर पाया हूॅ और नही कर पाऊॅगा। और आगे बोले जो मानुष्य लेकर देना नही चाहते वे राक्षस कहलाते है। जो जितना लेते है। उतना नाप तौल कर लौटाते है वे मनुष्य है।। जो जितना लेते है। उससे कई गुना देते है और सोचते है कि एहसान का बदला काफी अधिक चुका दिया वे देवता के बराबर होते है।

Spread the love

Leave a Reply