Tue. Jun 23rd, 2026

शंकराचार्य हास्पिट  के आइसीयू में कार्यरत लगभग  23 साल की नर्स  ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। मृतका नर्स ने हास्पिटल से लगे हास्टल के रूम में फांसी लगाई है। वहीं फांसी पर झूलती लाश देख अस्पताल स्टाफ में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। फिलहाल इस सुसाइड मामले में स्मृति नगर पुलिस जांच कर रही है। बता दें मृतका के पास से कोई आत्महत्या नोट  नहीं मिला है। वहीं आत्महत्या का कारण अपरिचित बताया जा रहा है।

मिली जानकारी के अनुसार मृतका का नाम दामिनी सिंह निवासी खैरागढ़ बताया गया है। वह दो साल से शंकराचार्य हास्पिटल में कार्यरत थी। आत्महत्या वाले दिन उसकी ड्यूटी आइसीयू कक्ष में थी। बताया जा रहा है कि दामिनी बुधवार सुबह आइसीयू कक्ष में ड्यूटी पर थी। वहीं दोपहर लगभग 2  बजे वह हास्पिटल से लगे अपने हास्टल में गई और फांसी लगा ली। जिसके बाद अस्पताल में कार्यरत दूसरी नर्स ने दामिनी की लाश फांसी पर झूलता देख अस्पताल प्रबंधन को इसकी सूचना दी। स्मृति नगर पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है।

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खेत बचाओ अभियान अंतर्गत भोजपुर जिला के दो गांव में किसानों को दिया प्रशिक्षण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा संचालित “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के दो गांवों में किसानों के लिए जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, फसल सुरक्षा तथा मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। अभियान के अंतर्गत पहला कार्यक्रम धनछुआ गांव, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें कुल 30 किसानों ने भाग लिया। प्रतिभागियों में 27 पुरुष एवं 3 महिला किसान शामिल थीं। वहीं दूसरा कार्यक्रम कोनी गांव, चौरी पंचायत, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें 31 किसानों ने सहभागिता की। प्रशिक्षण कार्यक्रम में आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना से विशेषज्ञगण डॉ. पंकज कुमार, डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी तथा श्री ए.एस. महापात्रा मौजूद थे। साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्र, आरा के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह मौजूद थे। विशेषज्ञों ने किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करने से फसलों को आवश्यक पोषक तत्व उचित मात्रा में प्राप्त होते हैं, जिससे उत्पादन लागत कम होती है तथा फसल की उत्पादकता में वृद्धि होती है। उन्होंने रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से बचने तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने पर बल दिया। कार्यक्रम के दौरान किसानों को हरित खाद के महत्व से भी अवगत कराया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि धैंचा एवं सनई जैसी फसलों का उपयोग हरित खाद के रूप में करने से मिट्टी में जैविक कार्बन एवं नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, मृदा की संरचना में सुधार होता है तथा भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। उन्होंने किसानों को खरीफ मौसम में धैंचा एवं सनई की खेती कर उन्हें खेत में पलटने की तकनीक एवं उसके लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। कार्यक्रम के दौरान किसानों की समस्याओं एवं जिज्ञासाओं का समाधान भी किया गया। किसानों ने प्रशिक्षण कार्यक्रम को अति उपयोगी बता, ऐसी जागरुकता गतिविधियों के निरंतर आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया