जैविक प्रयोगों की बंद दुनिया और मानवता का खुला सवाल
संदेह को प्रमाण न बनाएं लेकिन सवालों को दबाएं भी नहीं
बिमल सर्राफ
रूस में एक प्रयोगशाला कर्मी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने कोरोना महामारी की भयावह यादों को फिर ताजा कर दिया है। इरकुत्स्क स्थित एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट की 28 वर्षीय कर्मचारी दार्या शिपिलोवा की 2 अक्टूबर को अज्ञात कारणों वाली निमोनिया से मौत हुई। एहतियात के तौर पर लगभग 200 लोगों को निगरानी में रखा गया। हालांकि अब तक किसी संपर्क व्यक्ति में संबंधित खतरनाक रोगजनक मिलने की पुष्टि नहीं हुई है और रूसी अधिकारियों ने महामारी के खतरे से इनकार किया है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी तक ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे कहा जा सके कि महिला की मौत किसी जैविक प्रयोग की दुर्घटना या जैविक हथियार के कारण हुई। सोशल मीडिया पर टेस्ट ट्यूब टूटने, प्लेग संक्रमण अथवा प्रयोगशाला दुर्घटना जैसी कई बातें कही जा रही हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी इन दावों की पुष्टि नहीं करती।
फिर सवाल उठता है कि चिंता क्यों?
क्योंकि वह एक ऐसे संस्थान में काम करती थीं जहां खतरनाक संक्रामक रोगों पर अनुसंधान होता है। ऐसे मामलों में स्वाभाविक रूप से पारदर्शिता की मांग बढ़ जाती है। WHO ने भी रूस से यह स्पष्ट करने को कहा है कि कौन-कौन से परीक्षण किए गए, किन रोगजनकों की जांच हुई और यदि मृत्यु प्लेग से नहीं हुई तो वास्तविक कारण क्या था।
यही वह जगह है जहां आरोप और तथ्य को अलग रखना जरूरी है।
जैविक अनुसंधान अपने आप में मानवता के विरुद्ध कोई काम नहीं है। दुनिया भर में वैज्ञानिक वायरस और बैक्टीरिया पर इसलिए शोध करते हैं ताकि बीमारियों की पहचान, उपचार, टीके और भविष्य की महामारियों से बचाव किया जा सके। WHO भी उच्च जोखिम वाले रोगजनकों पर जिम्मेदार अनुसंधान को आवश्यक मानता है, लेकिन इसके साथ मजबूत जैव-सुरक्षा, निगरानी और जोखिम प्रबंधन पर जोर देता है।
चिंता तब पैदा होती है जब ऐसे अनुसंधान में पारदर्शिता कम हो, सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हो या किसी दुर्घटना की जानकारी समय पर साझा न की जाए। WHO स्वयं मानता है कि जैव-सुरक्षा और जैव-सुरक्षा प्रबंधन दुनिया के कई हिस्सों में अभी भी कमजोर क्षमताओं में शामिल हैं।
इसलिए यह पूछना उचित है कि क्या दुनिया के सभी उच्च जोखिम वाले जैविक प्रयोग पर्याप्त स्वतंत्र निगरानी में हैं? क्या किसी प्रयोगशाला दुर्घटना की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तत्काल और पूरी जानकारी मिलती है?
लेकिन इन सवालों को किसी एक देश के खिलाफ आरोप में बदल देना भी उचित नहीं होगा।
कोरोना महामारी के बाद दुनिया की संवेदनशीलता स्वाभाविक रूप से बढ़ी है। किसी अज्ञात निमोनिया या प्रयोगशाला कर्मचारी की मौत की खबर अब तुरंत वैश्विक चिंता पैदा करती है। लेकिन हर अज्ञात बीमारी नई महामारी नहीं होती और हर प्रयोगशाला दुर्घटना जैविक हथियार का प्रमाण नहीं होती।
फिर भी पारदर्शिता क्यों जरूरी है? इसलिए कि सूचना की कमी अफवाहों को जन्म देती है और अफवाहें जनता के विश्वास को कमजोर करती हैं।
भारत को क्या करना चाहिए?
भारत को इस घटना पर न तो घबराहट फैलानी चाहिए और न ही इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना चाहिए। हमारी नीति “सतर्कता, वैज्ञानिक जांच और पारदर्शिता” पर आधारित होनी चाहिए।
भारत को अपनी उच्च-सुरक्षा प्रयोगशालाओं के मानकों की नियमित समीक्षा करनी चाहिए, संक्रामक रोगों की निगरानी और जीनोमिक सर्विलांस को मजबूत करना चाहिए तथा किसी असामान्य संक्रमण की स्थिति में त्वरित जांच की क्षमता बढ़ानी चाहिए।
उक्त विश्लेषण लायंस क्लब इंटरनेशनल 322ई जोन 41 के जोन चेयरपर्सन सह डिस्ट्रिक्ट चेयरपर्सन एवं भारत विकास परिषद् , रक्सौल के सेवा संयोजक सह मीडिया प्रभारी सह सामाजिक कार्यकर्ता बिमल सर्राफ ने प्रेस से साझा किया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को यह पक्ष मजबूती से रखना चाहिए कि उच्च जोखिम वाले जैविक अनुसंधान में मानव सुरक्षा सर्वोपरि हो, प्रयोगशालाओं की स्वतंत्र निगरानी हो और गंभीर दुर्घटनाओं की सूचना समय पर साझा की जाए। WHO की वर्तमान जैव-सुरक्षा गाइडलाइन भी राष्ट्रीय और संस्थागत स्तर पर जोखिम मूल्यांकन तथा निगरानी व्यवस्था को महत्वपूर्ण मानती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को बिना प्रमाण किसी देश पर आरोप लगाने के बजाय तथ्यों की स्वतंत्र जांच और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समर्थन करना चाहिए।
रूस की यह घटना फिलहाल किसी नए कोरोना जैसी महामारी का प्रमाण नहीं है। लेकिन यह दुनिया के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न जरूर रखती है—
विज्ञान की शक्ति जितनी बढ़ रही है, क्या उसके साथ हमारी जिम्मेदारी और पारदर्शिता भी उतनी ही बढ़ रही है?
क्योंकि वायरस सीमाएं नहीं पहचानते।
इसलिए विज्ञान आगे बढ़े, अनुसंधान भी हो—लेकिन मानव जीवन की सुरक्षा, वैज्ञानिक नैतिकता और पारदर्शिता की कीमत पर नहीं।
संदेह को प्रमाण न बनाएं,
लेकिन सवालों को दबाएं भी नहीं।
क्योंकि मानवता की सुरक्षा के लिए दोनों जरूरी हैं—विज्ञान भी और विवेक भी।
