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भा०कृ०अनु०प० का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना ने
बिहार में एल-नीनो के प्रभाव को न्यून करने को आवश्यक कृषि परामर्श  दिया

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पटना : मानसून के तीन माह बीत जाने पर भी राज्य में वर्षा की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। जून से लेकर अगस्त तक में राज्य में केवल 467.9 मिमी वर्षा दर्ज की गई है, जो कि सामान्य से लगभग 40% कम है। औरंगाबाद, सीवान, लखीसराय और खगड़िया को छोड़ कर, राज्य के सभी 34 जिला में वर्षा की भारी कमी देखी गई है, विशेषकर जहानाबाद (-61%) और शिवहर (-60%) में। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) पटना केंद्र के अनुसार, सितम्बर 2026 माह में राज्य के उत्तरी भागों में सामान्य से कम, जबकि राज्य के दक्षिणी भाग में सामान्य तथा सामान्य से अधिक वर्षा होने का पूर्वानुमान है। सितम्बर 2026 माह में, राज्य के अधिकांश भागों में अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान के सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। आसन्न 5 दिन में राज्य के अधिकतम और न्यूनतम तापमान में कोई विशेष परिवर्तन की संभावना नहीं है। दिनाँक 2-5 सितम्बर के क्रम राज्य के उत्तर पश्चिमी, उत्तर मध्य और दक्षिण पूर्वी जिलों में अनेक स्थान पर मेघ-गर्जन/वज्रपात, तेज हवा के साथ मध्यम से भारी वर्षा की संभावना है, जबकि शेष उत्तरी और दक्षिणी जिलों में हल्के स्तर की वर्षा की संभावना है। इस स्थिति में वर्षा की कमी/सूखे से जूझ रहे जिलों में, खरीफ की फसलों और पशुधन को संभावित नुकसान से बचाने के लिए, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को कुछ महत्वपूर्ण उपायों को अपनाने का परामर्श दिया गया है। खेत को खरपतवार-मुक्त रखें और खेतों में पौधों की उचित संख्या सुनिश्चित करें। खरपतवार नियंत्रण को पलवार (मल्चिंग) अथवा जहाँ संभव हो, कोनो-वीडर का यथा प्रयोग करें।
धान के खेतों में रोपाई के 50-55 दिनों पर एक निकौनी करें। खेतों से वर्षा/सिंचाई के जल के रिसाव को रोकने के लिए मेड़ों की मरम्मत करें।
खेत की सिंचाई तभी करें, जब मिट्टी की सतह पर हल्की दरारें दिखने लगें। खेत को लगातार पानी से भरकर रखने के बजाय ‘वैकल्पिक गीला और सूखा’ (एडब्लूडी ) सिंचाई पद्धति अपनाएँ। धान के खेतों में, वृद्धि के महत्वपूर्ण चरण- कल्ले फूटने की सक्रिय अवस्था एक सिंचाई अवश्य करें और इस अवस्था पर 25% अतिरिक्त नाइट्रोजन का उपरिवेशन करें।
पोषक तत्वों के रिसाव और वाष्पीकरण से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए नीम लेपित यूरिया/ सल्फर कोटेड यूरिया का उपयोग करें।
वर्षा की कमी के कारण, फसलों की वानस्पतिक वृद्धि के चरण में आने वाले तनाव जैसे सूखा या पोषण की कमी से उबरने के लिए पत्तियों पर 2% (20 ग्राम प्रति लीटर पानी) यूरिया/ 2% पोटेशियम क्लोराइड / 1% (10 ग्राम प्रति लीटर पानी) पोटेशियम नाइट्रेट या एन:पी:के (15:15:15) के घोल का छिड़काव करें। वर्षा या सिंचाई के बाद ही फसलों को पोषक तत्व दें और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होने पर 0.5% जिंक सल्फेट का छिड़काव करें।
सब्जी फसलों में मल्चिंग करें जो कि कम वर्षा की स्थिति में नमी बनाये रखने में सहायक होगी तथा अधिक वर्षा की स्थिति में पौधों को टूटने/ गलने से बचाएगी। संभावित स्थितियों में कीट और बीमारी के प्रकोप से बचाव के लिए फसलों की निगरानी अवश्य करें और आवश्यकता पड़ने पर ही बीमारी/ कीट प्रबंधन को अनुमोदित दवा की अनुशंसित मात्रा का प्रयोग करें।
पशुओं के लिए हर समय स्वच्छ, ठंडा एवं पर्याप्त मात्रा में पेयजल की उपलब्धता बनाए रखें।
पशुओं का गलघोटू, ब्लैक क्वार्टर, एन्थ्रेक्स तथा लम्पी स्किन डिजीज के बचाव को समय पर टीकाकरण अवश्य कराएँ। उपलब्ध अतिरिक्त हरे चारे को साइलेज और हे (सूखा चारा) के रूप में संरक्षित करें। पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए ज्वार, बाजरा एवं लोबिया जैसी सूखा सहिष्णु चारा फसलों को उगाएं। आवश्यकता पड़ने पर बबूल, पीपल, बरगद एवं शहतूत जैसे पौष्टिक वृक्षों की पत्तियों का भी चारे के रूप में सीमित मात्रा में उपयोग करें।

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By Awadhesh Sharma

न्यूज एन व्यूज फॉर नेशन

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