Wed. Jun 24th, 2026
उन्नत कृषि तकनीक द्वारा धान-परती भूमि प्रबंधन विषयक दो दिवसीय प्रशिक्षण व कार्यशाला सम्पन्न

पटना : डॉ.अनुप दास के नेतृत्व में, पूर्वी भारत के धान-परती क्षेत्र को हरा-भरा बनाने के लिए एक व्यापक कार्यक्रम संचालित है। धान-परती भूमि में रबी फसल उत्पादन के दौरान कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनमें प्रमुख समस्या भूमि में नमी की कमी और अपर्याप्त सिंचाई व्यवस्था है। जब खेतों में पानी की कमी होती है, तो फसलों की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा, दलहन और तिलहन जैसी फसलों के लिए उपयुक्त और जल्दी पकने वाली किस्मों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है, जिसके कारण रबी फसल का उत्पादन प्रभावित होता है। इस समस्या से निपटने के लिए किसानों में उन्नत कृषि तकनीकों के प्रति जानकारी की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण बनता है, जिससे उनका उत्पादन क्षमता पूरी तरह से नहीं बढ़ पाता। इस समस्या के समाधान के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना, विशेष प्रयास कर रहा है। डॉ. अनुप दास के नेतृत्व में, पूर्वी भारत के धान-परती क्षेत्र को हरा-भरा बनाने के लिए एक व्यापक कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को उन्नत कृषि तकनीकों से परिचित कराना और उनके उत्पादन क्षमता को बढ़ाना है। गया जिला के टेकारी प्रखंड के गुलेरियाचक गांव में 24 दिसंबर 2024 को एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें किसानों को मिट्टी की नमी बनाए रखने और दलहन तथा तिलहन जैसी फसलों के सफल उत्पादन की विधि की जानकारी दी गई । इस कार्यक्रम का संचालन डॉ. राकेश कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक, और उनकी टीम द्वारा किया गया। विशेषज्ञों ने किसानों को सही सिंचाई प्रबंधन, भूमि संरक्षण उपायों और आधुनिक कृषि विधियों की जानकारी दी।
इस कार्यक्रम में किसानों को बताया गया कि वे अपनी भूमि में नमी को कैसे बनाए रख सकते हैं, ताकि फसलें बेहतर तरीके से बढ़ सकें, विशेषकर दलहन और तिलहन जैसी महत्वपूर्ण फसलों का उत्पादन किया जा सके। इस प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन निरंतर किया जाता है, ताकि किसानों को नवीनतम कृषि तकनीकों की जानकारी मिल सके और वे अपनी खेती में सुधार कर सकें।
कार्यक्रम में उर्वरक प्रबंधन के लिए NPK (15:15:15) स्प्रे और मृदा परीक्षण के लाभों पर भी चर्चा की गई। NPK 15:15:15 (2 मिली/लीटर) का पत्तियों पर छिड़काव असिंचित परिस्थितियों में पौधों को तुरंत पोषक तत्व प्रदान करता है, विशेषकर नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश। इससे फसल की वृद्धि, विकास और सूखा सहनशीलता में सुधार होता है, जिससे पानी की कमी के बावजूद उपज में वृद्धि होती है। NPK का उपयोग दलहन और तिलहन में पत्तीयों के विकास और फलन (पॉडिंग) के दौरान पोषक तत्वों की संतुलित आपूर्ति के लिए किया जाता है, जिससे पौधों की वृद्धि बढ़ती है, फूलों और फलों की गुणवत्ता में सुधार होता है, और उपज में वृद्धि होती है। इस कार्यक्रम में कुल 34 किसानों ने भाग लिया और कृषि विज्ञान केंद्र मानपुर, गया ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार, यह कार्यक्रम किसानों को उन्नत कृषि तकनीकों से अवगत कराकर उनकी कृषि उत्पादकता में सुधार लाने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।
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By Awadhesh Sharma

न्यूज एन व्यूज फॉर नेशन

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खेत बचाओ अभियान अंतर्गत भोजपुर जिला के दो गांव में किसानों को दिया प्रशिक्षण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा संचालित “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के दो गांवों में किसानों के लिए जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, फसल सुरक्षा तथा मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। अभियान के अंतर्गत पहला कार्यक्रम धनछुआ गांव, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें कुल 30 किसानों ने भाग लिया। प्रतिभागियों में 27 पुरुष एवं 3 महिला किसान शामिल थीं। वहीं दूसरा कार्यक्रम कोनी गांव, चौरी पंचायत, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें 31 किसानों ने सहभागिता की। प्रशिक्षण कार्यक्रम में आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना से विशेषज्ञगण डॉ. पंकज कुमार, डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी तथा श्री ए.एस. महापात्रा मौजूद थे। साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्र, आरा के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह मौजूद थे। विशेषज्ञों ने किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करने से फसलों को आवश्यक पोषक तत्व उचित मात्रा में प्राप्त होते हैं, जिससे उत्पादन लागत कम होती है तथा फसल की उत्पादकता में वृद्धि होती है। उन्होंने रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से बचने तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने पर बल दिया। कार्यक्रम के दौरान किसानों को हरित खाद के महत्व से भी अवगत कराया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि धैंचा एवं सनई जैसी फसलों का उपयोग हरित खाद के रूप में करने से मिट्टी में जैविक कार्बन एवं नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, मृदा की संरचना में सुधार होता है तथा भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। उन्होंने किसानों को खरीफ मौसम में धैंचा एवं सनई की खेती कर उन्हें खेत में पलटने की तकनीक एवं उसके लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। कार्यक्रम के दौरान किसानों की समस्याओं एवं जिज्ञासाओं का समाधान भी किया गया। किसानों ने प्रशिक्षण कार्यक्रम को अति उपयोगी बता, ऐसी जागरुकता गतिविधियों के निरंतर आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया