Wed. Jun 24th, 2026

किसी के स्वभाव संस्कार किसी के कठोर व्यवहार किसी से अपमानित होना या किसी सें दुख पाना, इन बातो सें जब गुजरते है। तो एक कटु अनुभव सदा के लिए स्मृति बनकर रह जाता है। वह स्मृति हमारी नैतिक व आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में एक रुकावट बन खडी हो जाती है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि जिसने दुख दिया वह व्यक्ति रुकावट नही बनता लेकिन उसके प्रति हमारे मन में बनी नफरत की वृत्ति रुकावट बन जाती है। उस वृत्ति का परिणाम क्या होगा निच्श्रित रुप से हानि किसकी अन्य किसी की नही खुद हमारी हैं उस व्यक्ति के कमजोर स्वभाव के कारण जो दुख मिला वह तो अल्पकाल का था लेकिन उस दुख को स्मृति में रखने की हमारी कमजोरी ने उस दुख को स्थाई कर डाला।

माफ करना कायरता नही बल्कि परम वीरता है।

अगर कोई कहते हैं कि चलो जो हुआ सों हुआ, उसको माफ कर दो। तब जवाब मिलता है। क्यों एक तो उससे दुख पाया और ऊपर से माफ भी करे? अक्सर देखा गया है, जब किसी से दुख होते है। तब लोग उसको सब सिखाना या उसके साथ लेना उचित समझते है। न कि माफ करना बदला लेना यह बहादुरी और माफ करना यह कायरता समझते है। आप बताइए जब लोगो ने काँस पर चढ़ाकर हाथो और पैरो को किलो से ठोकी तो क्या जीसस क्राइस्ट ने भगवान से उन लोगो को सजा देने प्रार्थना की? नही इतिहास के पन्ने पर सोने के अक्षरो से लिखा है। कि क्राइस्ट नें उनको माफ करने की प्रार्थना भगवान से की थी। माफ करना कायरता नही बल्कि परम वीरता है।

 

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खेत बचाओ अभियान अंतर्गत भोजपुर जिला के दो गांव में किसानों को दिया प्रशिक्षण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा संचालित “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के दो गांवों में किसानों के लिए जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, फसल सुरक्षा तथा मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। अभियान के अंतर्गत पहला कार्यक्रम धनछुआ गांव, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें कुल 30 किसानों ने भाग लिया। प्रतिभागियों में 27 पुरुष एवं 3 महिला किसान शामिल थीं। वहीं दूसरा कार्यक्रम कोनी गांव, चौरी पंचायत, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें 31 किसानों ने सहभागिता की। प्रशिक्षण कार्यक्रम में आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना से विशेषज्ञगण डॉ. पंकज कुमार, डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी तथा श्री ए.एस. महापात्रा मौजूद थे। साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्र, आरा के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह मौजूद थे। विशेषज्ञों ने किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करने से फसलों को आवश्यक पोषक तत्व उचित मात्रा में प्राप्त होते हैं, जिससे उत्पादन लागत कम होती है तथा फसल की उत्पादकता में वृद्धि होती है। उन्होंने रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से बचने तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने पर बल दिया। कार्यक्रम के दौरान किसानों को हरित खाद के महत्व से भी अवगत कराया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि धैंचा एवं सनई जैसी फसलों का उपयोग हरित खाद के रूप में करने से मिट्टी में जैविक कार्बन एवं नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, मृदा की संरचना में सुधार होता है तथा भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। उन्होंने किसानों को खरीफ मौसम में धैंचा एवं सनई की खेती कर उन्हें खेत में पलटने की तकनीक एवं उसके लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। कार्यक्रम के दौरान किसानों की समस्याओं एवं जिज्ञासाओं का समाधान भी किया गया। किसानों ने प्रशिक्षण कार्यक्रम को अति उपयोगी बता, ऐसी जागरुकता गतिविधियों के निरंतर आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया