Tue. Jun 23rd, 2026

वर्षा  के  सीजन आने वाला है।  और इससे पहले ही नगर  निगम प्रबंधन ने वर्षा  के दिनो में शहर में पानी  भराव के  नौबत ना आए, इसके लिए अधिकारियों को सूचना दे दिए गया हैं, कि  शहर के  सबसे प्रमुख कोसा नगर के  नाला का  वृद्धि, काम अभी  तक आधा भी नहीं हो पाया है। नगर निगम भिलाई लगभग  17  करोड़ 17 लाख की लागत से पूरे कोसानाला के काम का ठेका दिया गया है।  प्रतिधारक  प्राचीर से लेकर पुलिया  का निर्माण करना है, ताकि नाला के आसपास के  कॉलोनियों और नीचे के  बस्तियों में वर्षा के दिनों में जल भरने  के समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाए। 18 माह में इस काम को पूरा करने के लिए निगम ने अजेंसीय. को  काम करने  के लिया आर्डर दिया था। अब तक करीब  31 माह हो चुके हैं। नाला का काम पूरा तो दूर आधा भी नहीं हुआ है। अब तक लगभग मात्र 25 से 30  प्रतिशत काम ही पूरा हाे पाया है।

निगम प्रबंधन ने ठेकेदार को नोटिस दिया गया है कि  काम पूरा  जल्द करने के लिए कहा गया है। लेकिन ठेकेदार की लापरवाही की वजह से बारिश के सीजन में निचे के  बस्तियों में पानी भराव के  परिस्थिति  गठित, हो सकते  है। इससे बस्तियों में रहने वाले लोग फिर परेशान होंगे। उन्हें परेशानी उठाने  पड़ेगे ।

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खेत बचाओ अभियान अंतर्गत भोजपुर जिला के दो गांव में किसानों को दिया प्रशिक्षण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा संचालित “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के दो गांवों में किसानों के लिए जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, फसल सुरक्षा तथा मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। अभियान के अंतर्गत पहला कार्यक्रम धनछुआ गांव, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें कुल 30 किसानों ने भाग लिया। प्रतिभागियों में 27 पुरुष एवं 3 महिला किसान शामिल थीं। वहीं दूसरा कार्यक्रम कोनी गांव, चौरी पंचायत, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें 31 किसानों ने सहभागिता की। प्रशिक्षण कार्यक्रम में आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना से विशेषज्ञगण डॉ. पंकज कुमार, डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी तथा श्री ए.एस. महापात्रा मौजूद थे। साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्र, आरा के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह मौजूद थे। विशेषज्ञों ने किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करने से फसलों को आवश्यक पोषक तत्व उचित मात्रा में प्राप्त होते हैं, जिससे उत्पादन लागत कम होती है तथा फसल की उत्पादकता में वृद्धि होती है। उन्होंने रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से बचने तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने पर बल दिया। कार्यक्रम के दौरान किसानों को हरित खाद के महत्व से भी अवगत कराया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि धैंचा एवं सनई जैसी फसलों का उपयोग हरित खाद के रूप में करने से मिट्टी में जैविक कार्बन एवं नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, मृदा की संरचना में सुधार होता है तथा भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। उन्होंने किसानों को खरीफ मौसम में धैंचा एवं सनई की खेती कर उन्हें खेत में पलटने की तकनीक एवं उसके लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। कार्यक्रम के दौरान किसानों की समस्याओं एवं जिज्ञासाओं का समाधान भी किया गया। किसानों ने प्रशिक्षण कार्यक्रम को अति उपयोगी बता, ऐसी जागरुकता गतिविधियों के निरंतर आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया