Mon. May 27th, 2024
शावक की सुरक्षित वन वापसी के लिए रात्री गस्ती की जा रही है: रेंजर 
बेतिया: पश्चिम चम्पारण जिला अंतर्गत बिहार का इकलौता वाल्मीकि व्याघ्र अभ्यारण्य है। लगभग 910 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना के मंगुराहा वन क्षेत्र से भटक कर मानवीय आवासीय क्षेत्र में 18 दिनों से भटक रहा है। जिससे गौनाहा प्रखण्ड क्षेत्र एवं नरकटियागंज अनुमंडल क्षेत्र के लोग भयाक्रांत हैं।  शावक अब  जंगल की तरफ लौटने लगा है। विदित हो कि उपर्युक्त शावक को लेकर मितनी, बलुआ, पिपरा, टिकुल टोला, बेलसंडी कोहरगड्डी, मरजदी- मरजादपुर, भितिहरवा सहित दर्जनों गांव के लोगों में भय का वातावरण बना हुआ है। बाघ के शावक के डर  से लोग सरेह में स्थित खेत न तो अकेले जा रहे है, नहीं पशु को लेकर कहीं जाने की हिम्मत जुटा पा रहे है। मंगुराहा वन क्षेत्र के रेंजर सुनील कुमार पाठक के हवाले से बताया गया है कि शावक 8 से 10 किलोमीटर दूर जंगल से निकला रहा, परंतु अब दोन नहर पार कर पिपरिया सोलर प्लांट के इर्द-गिर्द पहुंचा है, जो जंगल से चार-पांच किलोमीटर दूरी पर स्थित है। रेंजर का एक बयान कि  शावक अकेला हैं, लोगों को राहत मिली है। शावक के साथ मादा बाघ की चर्चा से लोगों की नींद उड़ी रही। अलबत्ता रेंजर के हवाले से बताया गया है कि मादा बाघ शावक के साथ न कभी थी, नहीं वर्तमान में है। वन कर्मियों ने बताया कि बाघिन शावक को एक से डेढ़ वर्ष तक अपने साथ रख कर शिकार करना सिखाती है। उसके बाद शावक खुद शिकार करने लगता है। उपर्युक्त शावक अब खुद शिकार करने लायक हो गया है। इसलिए वह अब मादा बाघ उसके साथ नहीं है। रेंजर के अनुसार कि शावक दो दिन पूर्व दोन नहर के पास आया, परंतु वह दक्षिण दिशा में लौट गया।  वर्तमान में शावक अब दोन नहर पार कर चुका है। उम्मीद है की एक से दो दिन में जंगल में प्रवेश कर जाएगा। उनका कहना है कि बाघ को दिन में धुंधला दिखाई देता है। यही कारण है कि उपर्युक्त शावक सुबह होते ही गन्ने की खेत में प्रवेश कर छुप जाता है। बाघ को रात में बहुत दूर तक साफ दिखाई देता है।  यही कारण है कि शावक रात होने पर गन्ने के खेत से निकलकर अन्यत्र जाता है। उन्होंने कहा कि खेत का मिट्टी कड़ा हो जाने के कारण उसके फूट मार्क का सही टैगिंग नहीं हो पा रहा है। मंगूराहा व गोवर्धना वन क्षेत्र के वनकर्मी उपर्यूक्त गांव के सरेह में सुबह से शाम तक टैगिंग करने में जुटे हुए हैं, परंतु शावक के फूट मार्क का सही टैगिंग नहीं हो पा रहा है। शावक के पुराने पग मार्क का ही टैगिंग हो पाया है। रेंजर व अन्य वनकर्मी रात में शावक के फूट मार्क की टैगिंग करने में लगे हैं। उनका कहना है कि एक दिन भितिहरवा चिमनी के पास फूट मार्क दिखाई देने की बात बताई गई। परंतु जब उस फूट मार्क की टैगिंग की गई तो पता चला कि फूटमार्क शावक का नहीं कुत्ते का पाया गया। वैसे तो उस शावक को फंसाने के लिए टीकुल टोला, बेलसंडी गांव के उत्तर व दक्षिण सरेह में गन्ने के खेत में पिंजरा लगाया गया है कि कहीं शावक आकर इसमें फंस जाए। मंगूराहां व गोवर्धन वनक्षेत्र के वन कर्मियों द्वारा प्रतिदिन शावक के फूट मार्क का टैगिंग किया जा रहा है।
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By Awadhesh Sharma

न्यूज एन व्यूज फॉर नेशन

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