Mon. Jun 22nd, 2026

देश के सभी 45 केंन्द्रीय विश्वविधालयों में स्नातक स्तर (यूजी) मे प्रवेश के लिए यूजीसी ने एक काँमन एंट्रेस टेस्ट का खाका तैयार किया है। यह देखने मे आया कि कई राज्यों के शिक्षा बोर्ड इंटरमीड़िएट स्तर पर अंक देने में दरयादिली दिखाते हैं, जिससे दूसरे राज्यों के बच्चों का दाखिला प्रंभावित होता हैं। कट आँफ का दबाव इतना बढ़ता गया है कि पिछले वर्ष डीयू के आठ काँलेजों में 11 कोर्सेजों में कट आँफ शत प्रतिशत रखा गया योजना के तहत 3 घंटा 30 मिंनट की केवल एक परीक्षा होगी, जिसके तीन खंड़ होगे। हालांकि कुछ शिक्षाविद कह रहे हैं कि अससे स्कूल और माध्यमिक स्तर की परीक्षाओं का तहत्व खत्म हो जाएगा लेकिन वे भूल रहे हैं कि नई शिक्षा नीति 5,3,3,4 के तहत स्कूल और माध्यमिक स्तर पर भी प्रोफेशनल कोर्सेज लाए जा रहे हैं ताकि उन्हें रोजगार के लिए उपयोगी बनाया जा सके। हाई स्कूल और इंटर तक के कोर्स में पत्रकारिता और वोकेशनल कोर्स लाने के उदेश्यहीन उच्च शिक्षा की ड़िग्री लेने वालों का दबाव कम होगा। देखना होगा कि 45 केन्द्रीय यूनिवर्सिटीज मे से दों एएमयू और जामिया मिलिया क्या प्रतिक्रिया देते है।

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खेत बचाओ अभियान अंतर्गत भोजपुर जिला के दो गांव में किसानों को दिया प्रशिक्षण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा संचालित “खेत बचाओ अभियान” के अंतर्गत भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के दो गांवों में किसानों के लिए जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, फसल सुरक्षा तथा मृदा स्वास्थ्य संरक्षण के प्रति जागरूक करना था। अभियान के अंतर्गत पहला कार्यक्रम धनछुआ गांव, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें कुल 30 किसानों ने भाग लिया। प्रतिभागियों में 27 पुरुष एवं 3 महिला किसान शामिल थीं। वहीं दूसरा कार्यक्रम कोनी गांव, चौरी पंचायत, सहार प्रखंड, भोजपुर में आयोजित किया गया, जिसमें 31 किसानों ने सहभागिता की। प्रशिक्षण कार्यक्रम में आईसीएआर-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना से विशेषज्ञगण डॉ. पंकज कुमार, डॉ. मनोज कुमार त्रिपाठी तथा श्री ए.एस. महापात्रा मौजूद थे। साथ ही, कृषि विज्ञान केंद्र, आरा के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह मौजूद थे। विशेषज्ञों ने किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करने से फसलों को आवश्यक पोषक तत्व उचित मात्रा में प्राप्त होते हैं, जिससे उत्पादन लागत कम होती है तथा फसल की उत्पादकता में वृद्धि होती है। उन्होंने रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से बचने तथा एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने पर बल दिया। कार्यक्रम के दौरान किसानों को हरित खाद के महत्व से भी अवगत कराया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि धैंचा एवं सनई जैसी फसलों का उपयोग हरित खाद के रूप में करने से मिट्टी में जैविक कार्बन एवं नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, मृदा की संरचना में सुधार होता है तथा भूमि की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। उन्होंने किसानों को खरीफ मौसम में धैंचा एवं सनई की खेती कर उन्हें खेत में पलटने की तकनीक एवं उसके लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। कार्यक्रम के दौरान किसानों की समस्याओं एवं जिज्ञासाओं का समाधान भी किया गया। किसानों ने प्रशिक्षण कार्यक्रम को अति उपयोगी बता, ऐसी जागरुकता गतिविधियों के निरंतर आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया