Wed. Nov 4th, 2026

धार्मिक इतिहास के पन्ने पलटने सें पता चलता हैं कि द्वापर युग के आरंभ से लेकर अब तक ब्रह्मचर्य को प्रायः व्यक्तिगत साधना के अंग के रुप में ही अपनाया जाता हैं अथवा इसें यम नियमो के अंतर्गत आत्मषुद्धि के लिए एक नियम के रुप में ही लिया जाता हैं। साधु सुन्यासी भिक्षु और पादरी मुक्ति को लक्ष्य मानकर तथा बाल बच्चों इत्यिादि कों बंधन जान कर घरबार के साथ साथ स्त्री का भी संन्यास करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करते रहे हैं।भारत में धर्मप्रेमी को लोग इसका संबंध शारीरिक आयु सें जोडकर तथा इसे शास्त्रआज्ञा मानकर शारीरिक जीवन के पहले करीब 23  साल में विद्या अध्ययन अर्थ या फिर 48 साल के आयु के बाद मुक्त की प्रत्यार्थ भी इसका पालन करते रहे हैं

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