समस्तीपुर में इंडियन रनर बत्तख पालन से बढ़ रहे रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर, अंडा उत्पादन को मिल रहा व्यावसायिक स्वरूप
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समस्तीपुर: बिहार के समस्तीपुरजिला में बत्तख पालन ग्रामीण परिवार के लिए आय संवर्धन एवं स्वरोजगार का एक उभरता माध्यम बन रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर (ICAR–RCER), पटना द्वारा संस्थान के निदेशक डॉ. अनूप दास के मार्गदर्शन में किए गये सर्वेक्षण में सामने आया है कि जिला में इंडियन रनर नस्ल की बत्तख किसानों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय है। किसान इस नस्ल का पालन मुख्य रूप से अंडा उत्पादन, चूजा बिक्री एवं मांस उत्पादन के लिए कर रहे हैं। यह सर्वेक्षण बिहार में बत्तखों की जैव विविधता के अध्ययन एवं संरक्षण के उद्देश्य से संचालित अनुसंधान पहल का भाग है। इसके अंतर्गत स्थानीय एवं अन्य बत्तख नस्लों की पहचान, उनके शारीरिक एवं उत्पादन संबंधी गुणों का दस्तावेजीकरण तथा मशीन लर्निंग आधारित वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से उपयोगी जर्मप्लाज्म की पहचान पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य स्थानीय बत्तख संसाधनों का संरक्षण करते हुए उनकी उत्पादन क्षमता एवं उपयोगिता को बढ़ावा देना है। सर्वेक्षण के क्रम में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रोहन कुमार रमन ने बत्तख पालक किसानों से संवाद कर उनकी उत्पादन प्रणाली, आर्थिक गतिविधियों एवं प्रमुख समस्याओं की जानकारी प्राप्त की। इस क्रम में हसनपुर के किसान शैलेन्द्र भारद्वाज की बत्तख पालन इकाई का भी अवलोकन किया। वे वर्तमान में लगभग 2,700 बत्तख के चूजों का पालन कर रहे हैं। उनका लक्ष्य बत्तख पालन का विस्तार करते हुए अंडा उत्पादन को व्यावसायिक स्तर पर विकसित करना है। सर्वेक्षण में बत्तख पालन की लाभप्रदता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में फीड की बढ़ती कीमत सामने आई। इस संबंध में ICAR–RCER के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विवेकानंद भारती ने किसानों को अजोला एवं राइस ब्रान (चावल की भूसी) जैसे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों को संतुलित आहार में शामिल करने की वैज्ञानिक संभावनाओं से अवगत कराया।
उन्होंने बताया कि स्थानीय संसाधनों का उचित एवं वैज्ञानिक उपयोग कर आहार लागत को कम किया जा सकता है, जिससे बत्तख पालन को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। इसी क्रम में शिवाजीनगर के किसान राजन कुमार की व्यावसायिक बत्तख पालन इकाई भी आकर्षण का केंद्र रही। वे पिछले ढाई वर्षों से इंडियन रनर नस्ल की बत्तखों का पालन कर रहे हैं। वर्तमान में उनके पास लगभग 500 बत्तख हैं तथा उनका मुख्य व्यवसाय अंडा उत्पादन एवं बिक्री है। वे प्रतिदिन औसतन 200–250 अंडों का विपणन करते हैं। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि शुरुआत में स्थानीय उपभोक्ताओं के बीच बत्तख के अंडों की स्वीकार्यता एवं मांग विकसित करना चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन निरंतर प्रयासों से इसकी बिक्री में धीरे-धीरे वृद्धि हुई है। उनका अनुभव दर्शाता है कि सफल बत्तख पालन के लिए उत्पादन के साथ-साथ बाजार की मांग विकसित करना भी आवश्यक है। सर्वेक्षण के अनुसार, समस्तीपुर जिला लगभग 10–12 किसान बत्तख पालन गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। हालांकि, बत्तख एवं उनके अंडों के व्यवस्थित विपणन और बाजार संपर्क की कमी इस व्यवसाय के विस्तार में एक प्रमुख बाधा है।
इस चुनौती के समाधान के लिए डॉ. रोहन कुमार रमन द्वारा बिहार के बत्तख पालक किसानों को एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की पहल की गई है। इसके माध्यम से किसान अपने उत्पादों, उपलब्धता एवं बिक्री संबंधी जानकारी साझा कर सकेंगे। साथ ही, उत्पादकों और संभावित खरीदारों के बीच सीधा संपर्क स्थापित होने से विपणन व्यवस्था को मजबूत करने और बाजार के नए अवसर विकसित करने में मदद मिलेगी। इस सर्वेक्षण में तरुण कुमार एवं रोशन कुमार का भी सराहनीय योगदान रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार, वैज्ञानिक प्रबंधन, स्थानीय संसाधनों पर आधारित संतुलित आहार, बेहतर उत्पादन प्रणाली, प्रभावी विपणन व्यवस्था एवं किसानों के आपसी समन्वय से बत्तख पालन को बिहार में एक लाभकारी ग्रामीण उद्यम के रूप में विकसित किया जा सकता है। साथ ही, स्थानीय बत्तख जर्मप्लाज्म का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण एवं संरक्षण राज्य की पशु जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे ग्रामीण परिवारों की अतिरिक्त आय बढ़ाने के साथ-साथ रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर भी विकसित होंगे।
