खेतों के मेंड़ पर अरहर लगाकर बढ़ायें आय और मिट्टी की उर्वरता : डॉ.अनुप

दलहनी फसलें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण : डॉ.अनुप दास
पटना : ‘बिहार में दलहन उत्पादन बढ़ाने की रणनीति’ विषयपर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम कृषि अनुसंधान परिसर, पटना में सम्पन्न हो गया। उपर्युक्त प्रशिक्षण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर,पटना में आयोजित किया गया। ‘बिहार में दलहन उत्पादन बढ़ाने की रणनीति’ विषयक तीन दिवसीय (10–12 मार्च, 2026) प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन हुआ। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम बामेती,पटना प्रायोजित रहा।कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों तथा प्रसार कर्मियों के ज्ञान एवं कौशल का विकास करना रहा, जिससे बिहार में दलहन उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तकनीकोंको अपनाया जा सके। तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना, भा.कृ.अनु.प.–भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर, राष्ट्रीय बीज निगम, पटना, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय तथा भा.कृ.अनु.प.–राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो, मऊ के वैज्ञानिकों ने किसानों तथा प्रसार कर्मियों को सैद्धांतिक एवंप्रायोगिक जानकारी प्रदान किया।
उपर्युक्त प्रशिक्षण के समापन कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि दलहनी फसलें कृषि प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि धान की कटाई के बाद खेत में अवशेष को सुरक्षित रखते हुए उन्नत तकनीकों यथा उत्तम बीज, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, मृदा स्वास्थ्य सुधार तथा जल प्रबंधन को अपनाकर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने किसानों को मेड़ पर अरहर जैसी दलहनी फसल लगाने का परामर्श दिया, जिससे अतिरिक्त आय के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार होता है।उन्होंने बताया कि दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर कर मिट्टी कीगुणवत्ता बढ़ाती हैं तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में सहायक होती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बीज उपचार के प्रसार में विस्तार कर्मियों की भूमिकाअत्यंत महत्वपूर्ण है और उन्हें प्रशिक्षण में प्राप्त जानकारी को अपने-अपने क्षेत्र में किसानों तक पहुँचाना चाहिए। डॉ. उज्ज्वल कुमार, प्रभागाध्यक्ष, सामाजिक-आर्थिक एवं प्रसार ने बताया कि दलहन उत्पादन में गुणवत्तायुक्त बीज की उपलब्धता एक प्रमुख चुनौती है। उन्होंने किसानों को उन्नत किस्में अपनाने, सामूहिक बीज उत्पादन करने तथा सीड हब जैसी पहलों का लाभ लेने की सलाह दी। डॉ. आशुतोष उपाध्याय, प्रभागाध्यक्ष, भूमि एवं जल प्रबंधन ने बताया कि उत्तम दलहन उत्पादन के लिए बीजोपचार, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और समय पर बुवाई अत्यंत आवश्यक है। डॉ. संजीव कुमार, प्रभागाध्यक्ष, फसल अनुसंधान ने कहा कि दलहन शाकाहारी लोगों के लिए प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है। उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को गुणवत्तायुक्त बीज, समय पर बुवाई तथा उचित फसल प्रबंधन अपनाना चाहिए। प्रशिक्षण के क्रम में प्रतिभागियों ने मसूर एवं चना में उकठा रोग, गुणवत्तायुक्त बीज की कमी तथा नीलगाय से होने वाले क्षति जैसी समस्याओं का उल्लेख किया। किसानों ने बताया कि प्रशिक्षण से उन्हें शून्य जुताई, बीज उपचार तथा वैज्ञानिक खेती की कई उपयोगी तकनीकों की जानकारी मिली। कार्यक्रम के क्रम में भोजपुर जिला के प्रगतिशील किसानश्री राधेश्याम पांडेय मिट्टी विषय पर प्रस्तुत कविता ने कार्यक्रम को विशेष आकर्षक बना दिया। तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में पाठ्यक्रम निदेशक डॉ.अरविंद कुमार चौधरी (प्रधान वैज्ञानिक) की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम का संचालन डॉ. कुमारी शुभा ने किया, जबकि अंत में डॉ. अभिषेक कुमार दुबे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। संस्थान के मीडिया सदस्य सचिव उमेश कुमार मिश्र ने बताया कि प्रशिक्षण कार्यक्रम में बिहार के पाँच जिलों पटना,औरंगाबाद, नालंदा, भोजपुर तथा गया से आये प्रसार कर्मियों एवं किसानों ने भाग लिया। कुल 20 प्रतिभागियों में 04 सहायक प्रौद्योगिकी प्रबंधक, 01 प्रखण्ड प्रौद्योगिकी प्रबंधक, 06 किसान सलाहकार तथा 09 प्रगतिशील किसान शामिल रहे।
