कृषि की अदृश्य रीढ़ को मिली स्वाभिमान और क्रांति की नई पहचान 
अखिल भारतीय महिला किसान कार्यकर्ता सम्मेलन नई दिल्ली
नई दिल्ली : ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ जहां नारियों का आदर सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है। सनातन संस्कृति का यह पावन विचार केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। बल्कि भारत के खेतों में हर दिन अन्न उपजाती ‘महिला किसान शक्ति’ के रूप में साकार होता है। भारतीय कृषि व्यवस्था का ताना-बाना अनादि काल से मातृशक्ति के अथक परिश्रम, त्याग व समर्पण पर टिका रहा है। खेत में बीज बोने से लेकर फसल की कटाई, मड़ाई, देसी बीजों का संरक्षण और पशुपालन तक खेती से जुड़े लगभग 60 से 70 प्रतिशत शारीरिक श्रम को महिलाएँ सँभालती हैं। इसके बावजूद, सामाजिक संरचना और सरकारी दस्तावेज़ों में उन्हें प्रायः केवल ‘खेतिहर मजदूर’ या परिवार की सहयोगी के रूप में ही देखा जाता रहा है।
इसी परिदृश्य व परिचय को बदलने और महिला किसानों को उनकी वास्तविक पहचान, सम्मान व स्वाभिमान दिलाने के उद्देश्य से 30 सितंबर 2026 को नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में भारतीय किसान संघ की महिला आयाम की देखरेख में अखिल भारतीय महिला किसान कार्यकर्ता सम्मेलन का भव्य एवं ऐतिहासिक आयोजन किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित ‘अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष 2026’ की पृष्ठभूमि में आयोजित यह सम्मेलन केवल एक संगठनात्मक बैठक नहीं, बल्कि भारतीय कृषि में महिलाओं के सशक्तीकरण का प्रस्फुटन और नीतियों के पुनर्गठन का नया शंखनाद साबित हुआ। सम्मेलन की सबसे अभूतपूर्व और प्रेरक विशेषता यह रही कि देश के कोने-कोने अर्था्त् अटक से कटक व कश्मीर से कन्याकुमारी के साथ ही पूर्वोत्तर के अरूणाचल व मणिपुर से आईं हजारों महिला किसानों ने किसी बाहरी मदद के बिना, स्वयं के खर्चे पर दिल्ली पहुँचकर अपनी बात को पूरी निडरता और स्पष्टता के साथ रखा। ‘जय बलराम और ‘नारी शक्ति जागेगी, सारी समस्या भागेगी’ के उद्घोषों के बीच के. डी. जाधव हॉल में ‘हम भारत की नारियाँ वैभव लाएँगी’ का संकल्प गूँज उठा।
देश भर में सक्रिय महिला किसान कार्यकर्ताओं का यह विशाल जमावड़ा भारतीय किसान संघ की मजबूत जमीनी पकड़, महिला स्वावलंबन और उनके उभरते नेतृत्व का साक्षात प्रमाण बना। आयोजन स्थल पर उत्साह, उमंग से भरी महिला किसान शक्ति ने अपने प्रांत की पारंपरिक वेशभूषा व अपनी स्थानीय भाषा में अपनी समस्याओं को निडर भाव से रखा। परिसर में विविधता में एकता के साथ भारत के एक लघु स्वरूप के दर्शन हुए। सम्मेलन में इस बात पर गहरा मंथन हुआ कि वर्ष 2047 के विकसित भारत और स्वस्थ भारत की संकल्पना केवल औद्योगिकीकरण से पूरी नहीं हो सकती, इसका आधार हमारी पारंपरिक ‘गौ-कृषि-वाणिज्यम्’ की अवधारणा ही होगी। जीएम (GM) बीज व जीन एडिटिंग तकनीक पर चिंता व्यक्त की गई। महिला किसानों ने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि देश, समाज और परिवार के समग्र स्वास्थ्य को सँभालने की प्राथमिक जिम्मेदारी नारी शक्ति अपनी गोद में लेगी। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सम्मेलन से पाँच प्रमुख स्तंभों विषमुक्त खेती और गौ आधारित जैविक कृषि, अमृत आहार, रोगमुक्त जीवन, व्यसनमुक्त मानव व लाभकारी कृषि उपज मूल्य का उद्घोष हुआ। यह सम्मेलन केवल विचारों के आदान-प्रदान का मंच नहीं था, बल्कि इसने देश की कृषि, किसान और ग्रामीण विकास नीतियों में व्यापक एवं बुनियादी परिवर्तनों की आवश्यकता को प्रखरता से रेखांकित किया। वर्तमान नीतियाँ अक्सर कॉर्पाेरेट और रसायनिक खेती के इर्द-गिर्द घूमती हैं, जबकि ज़मीनी हक़ीकत यह है कि ग्रामीण विकास की सफलता नारी शक्ति के हाथ में है। केंद्र व राज्य सरकारों को अपनी नीतियों के केंद्र में महिला किसानों को रखना होगा। आसान ऋण प्रणाली, स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और जैविक उत्पादों के विपणन की सरकारी नीतियों को महिलाओं की ज़मीनी ज़रूरतों के अनुकूल ढालना अनिवार्य है।
कार्यक्रम के सबसे भावुक और प्रेरणादायक क्षणों में वे पल शाशामिल रहे, दूर-दराज के क्षेत्रों से आईं उन महिला किसानों को राष्ट्रीय मंच पर सम्मानित किया गया, जिन्होंने प्रबल प्रतिकूल परिस्थितियों में भी खेती में उत्कृष्ट नवाचार किए हैं। देशी बीजों को लुप्त होने से बचाने वालीं, जैविक मॉडल फार्म तैयार करने वालीं और स्व-रोजगार से अन्य ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बनाने वाली कृषक नारियों के योगदान को पूरे सम्मान के साथ सराहा गया। इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में हुआ यह आयोजन इस बात का स्पष्ट संदेश है कि भारत जब सतत कृषि और समृद्ध ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बात करता है, तो उसे महिला किसानों को निर्णय लेने की अग्रिम पंक्ति में बिठाना ही होगा। उन्हें केवल भूमि पर श्रम करने वाली शक्ति नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता व स्वविवेक से पूर्ण निर्णय लेने वाली कृषक और कृषि-उद्यमी के रूप में वैधानिक व सामाजिक मान्यता देनी होगी। अपने बलबूते दिल्ली आकर ‘हम भारत की नारियाँ वैभव लाएँगी’ का उद्घोष करने वाली यह मातृशक्ति ‘अन्नदाता‘ शब्द को एक नया गौरव, नया सम्मान और देश को रोगमुक्त-समृद्ध भविष्य देने की दिशा में एक ऐतिहासिक क्रांति का सूत्रपात कर चुकी है। मेरा मानना है कि भारतीय किसान संघ तो मातृशक्ति को लेकर आगे बढ़ रहा है देश के सभी संगठनों को ऐसे आयोजन से सीख लेते हुए मातृशक्ति को उचित स्थान और सम्मान देना चाहिए।
