
पटना : एलनीनो के कारण अनियमित वर्षा, लंबे शुष्क अंतराल, अधिक तापमान, नमी की कमी तथा अचानक वर्षा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे कीट एवं रोगों की स्थिति प्रभावित होती है। अतः मौसम आधारित निगरानी, नमी संरक्षण तथा समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन (IPM/IDM) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सामान्य अनुशंसाएँ:
• फसल के जमने से लेकर उसके पकने तक, खासकर लंबे समय तक सूखे और बारिश के बाद, हर हफ़्ते खेत की निगरानी करें। कीटों की संख्या, बीमारी के लक्षण, फसल की अवस्था, मिट्टी में नमी और मौसम की स्थितियों पर नज़र रखें।
• इकोनॉमिक थ्रेशोल्ड लेवल (ETL) के आधार पर कीट प्रबंधन करें और अनावश्यक रासायनिक छिड़काव से बचें।
• नाइट्रोजन वाले उर्वरक का ज़्यादा इस्तेमाल न करें, क्योंकि इससे पौधे घनी पत्तियों वाले हो जाते हैं, जिससे रस चूसने वाले कीड़ों और फंगल बीमारियों के लिए बहुत अनुकूल माहौल बन जाता है।
• खेत की स्वच्छता बनाए रखें तथा अत्यधिक संक्रमित पौधों, रोगग्रस्त अवशेषों एवं स्वयं उगने वाले (volunteer) पौधों को हटा दें।
• अच्छी गुणवत्ता वाले बीज और स्वस्थ रोपण सामग्री का उपयोग करें। साथ ही, सुझाए गए तरीके से बीजों का उपचार करें; इसके लिए कार्बेन्डाजिम (2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) जैसे कवकनाशी या ट्राइकोडर्मा (6-10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) जैसे जैव-नियंत्रक का इस्तेमाल करें।
• कीटनाशी/फफूंदनाशी का प्रयोग आवश्यकता अनुसार, उपयुक्त मौसम में ही करें। तेज़ हवा, बारिश और बहुत ज़्यादा तापमान में इनका छिड़काव न करें; इसके लिए सुबह या शाम का सही समय चुनें।
प्रमुख कीट जोखिम एवं प्रबंधन:
• धान: अधिक तापमान एवं अपेक्षाकृत शुष्क परिस्थितियाँ भूरा फुदका, पत्ती लपेटक एवं तना छेदक के प्रकोप को बढ़ा सकती हैं, विशेषकर अत्यधिक नाइट्रोजन प्रयोग की स्थिति में। निचली पत्तियों एवं पौधों के आधार की नियमित निगरानी करें। नाइट्रोजन की अधिक मात्रा से बचें तथा अनावश्यक कीटनाशियों का प्रयोग न करें। लाइट ट्रैप/फेरोमोन ट्रैप तथा आवश्यकता अनुसार ट्राइकोग्रामा परजीवी कार्ड का प्रयोग करें। उचित जल प्रबंधन बनाए रखें तथा ETL के आधार पर ही कीटनाशी का प्रयोग करें।
• मक्का: गर्मी एवं मृदा नमी की कमी से विशेषकर छोटी अवस्था की मक्का फसल में फॉल आर्मीवर्म का जोखिम बढ़ सकता है। पौध विकास की प्रारंभिक अवस्था में पत्तियों के घुमावदार भाग की सप्ताह में कम से कम दो बार निगरानी करें। पत्तियों पर अंडों एवं लार्वा की उपस्थिति देखें, फेरोमोन ट्रैप का प्रयोग करें, पर्याप्त मृदा नमी बनाए रखें तथा ETL के आधार पर अनुशंसित कीटनाशियों का प्रयोग करें।
• दलहनी फसलें: गर्म एवं शुष्क परिस्थितियाँ फली छेदक, थ्रिप्स, सफेद मक्खी एवं माइट्स के प्रकोप को बढ़ा सकती हैं। फूल एवं फली बनने की अवस्था में नमी की कमी से उपज में अधिक हानि हो सकती है। फली छेदक की निगरानी हेतु फेरोमोन ट्रैप, पक्षियों के बैठने के लिए खंबे, प्रतिरोधी/सहिष्णु किस्मों तथा जैव-नियंत्रण का उपयोग करें। आवश्यकता के अनुसार समय पर सिंचाई करें। प्रारंभिक अवस्था में अनावश्यक कीटनाशी छिड़काव से बचें तथा खेत को खरपतवार-मुक्त रखें।
• सब्जी फसलें: सफेद मक्खी, थ्रिप्स, माइट्स तथा फल एवं तना छेदक जैसे कीटों का प्रकोप बढ़ सकता है। इनमें से कुछ कीट विषाणुजनित रोगों के वाहक भी होते हैं। पीले/नीले चिपचिपे कार्ड, फेरोमोन ट्रैप तथा कीटरोधी नर्सरी संरचनाओं का प्रयोग करें। आवश्यकता अनुसार अनुशंसित कीटनाशियों का प्रयोग करें। विषाणु रोग से संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट करें तथा खरपतवारों को नियंत्रित करें।
प्रमुख रोग जोखिम एवं प्रबंधन:
रोगों का विकास तापमान, सापेक्ष आर्द्रता, पत्तियों पर नमी की अवधि, वर्षा तथा फसल की स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए एल नीनो परिस्थितियों में सभी रोगों का प्रकोप कम हो, यह आवश्यक नहीं है। शुष्क परिस्थितियाँ कुछ अधिक नमी-निर्भर रोगों को कम कर सकती हैं, लेकिन सिंचाई, ओस, रात में अधिक आर्द्रता तथा अचानक होने वाली वर्षा संक्रमण के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकती हैं।
• धान: स्थानीय मौसम की स्थिति के अनुसार भूरा धब्बा, झुलसा/ब्लास्ट, शीथ ब्लाइट तथा जीवाणु झुलसा का प्रकोप हो सकता है। रोगमुक्त एवं उपचारित बीज का प्रयोग करें। संतुलित पोषण, विशेषकर पर्याप्त पोटाश की उपलब्धता सुनिश्चित करें तथा नाइट्रोजन की अधिक मात्रा से बचें। रोगरोधी/सहिष्णु किस्मों का चयन करें और उचित पौध दूरी एवं वायु का संचार बनाए रखें। पत्तियों पर लंबे समय तक नमी बनी रहने से बचें। वर्षा अथवा अधिक आर्द्रता के बाद खेतों की विशेष निगरानी करें तथा आवश्यकता होने पर रोग-विशिष्ट अनुशंसित फफूंदनाशियों का प्रयोग करें।
• दलहनी फसलें: अत्यधिक मृदा नमी की कमी एवं उच्च मृदा तापमान उकठा एवं जड़ सड़न जैसी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं, जबकि अल्प अवधि के लिए अधिक मृदा नमी कुछ जड़ रोगजनकों के विकास को बढ़ावा दे सकती है। उपचारित एवं रोगमुक्त बीज का प्रयोग करें तथा ट्राइकोडर्मा एवं अन्य अनुशंसित जैव-नियंत्रकों का उपयोग करें। फसल चक्र अपनाएं और आवश्यकतानुसार मृदा में पर्याप्त नमी बनाए रखें। भारी वर्षा के बाद जल निकास की उचित व्यवस्था करें तथा जहाँ संभव हो, अत्यधिक संक्रमित पौधों को निकालकर नष्ट करें।
• सब्जी फसलें: गर्म एवं अपेक्षाकृत शुष्क परिस्थितियों में चूर्णिल आसिता का प्रकोप बढ़ सकता है, जबकि वर्षा एवं अधिक आर्द्रता मृदुरोमिल आसिता, एन्थ्रेक्नोज, जीवाणुजनित रोग एवं फल सड़न को बढ़ावा दे सकती है। उचित पौध दूरी एवं वायु संचार बनाए रखें। अत्यधिक सिंचाई तथा पत्तियों पर लंबे समय तक नमी रहने से बचें और ड्रिप सिंचाई को प्राथमिकता दें। संक्रमित पौध भागों को हटाकर नष्ट करें तथा स्वस्थ नर्सरी पौधों का उपयोग करें। आवश्यकता के अनुसार रोग-विशिष्ट रसायनों का प्रयोग करें तथा फफूंदनाशियों के विभिन्न समूहों को बदल-बदलकर उपयोग करें।
विशेष सलाह: सूखे के बाद बारिश का समय बहुत अहम होता है क्योंकि फसल के आस-पास के माइक्रोक्लाइमेट में तेज़ी से बदलाव होने से कीड़े और बीमारियाँ फिर से बढ़ सकती हैं। शुष्क अवधि के बाद वर्षा होने पर 2–3 दिनों के भीतर खेतों का निरीक्षण करें। देखें कि कहीं पत्तियों पर धब्बे, झुलसा रोग, फफूंदी, जड़ या तने के निचले हिस्से में कोई समस्या या कीड़ों का प्रकोप तो नहीं है। जहाँ मुमकिन हो, वहाँ संक्रमित पौधों के हिस्सों को हटा देना चाहिए, लेकिन पूरे खेत में कीटनाशक का छिड़काव करने से बचना चाहिए। बीमारी के खतरे का अंदाज़ा लगाने और फफूंदनाशक का इस्तेमाल करने के लिए मौसम के पूर्वानुमान पर ध्यान देना चाहिए।
