
पटना : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना में अनुसूचित जाति उप-योजना के अंतर्गत “वैज्ञानिक विधि से बकरी पालन द्वारा किसानों की आजीविका में सुधार” विषय पर दिनांक 25 अगस्त 2026 को दो दिवसीय क्षमता निर्माण-सह-आदान सहायता कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम में गया जिले के टनकुप्पा प्रखंड के गजाधरपुर गांव के अनुसूचित जाति के 16 किसानों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक एवं लाभकारी तरीके से बकरी पालन की उन्नत तकनीकों से अवगत कराना, बकरी पालन को आय एवं आजीविका के एक प्रभावी साधन के रूप में विकसित करना तथा किसानों को समेकित एवं टिकाऊ कृषि प्रणालियों को अपनाने के लिए प्रेरित करना रहा । कार्यक्रम के अंतर्गत किसानों को बकरी पालन के साथ-साथ चारा उत्पादन, जल प्रबंधन, फलदार वृक्षारोपण तथा समेकित कृषि प्रणाली के विभिन्न पहलुओं के बारे में व्यावहारिक एवं तकनीकी जानकारी प्रदान की गई।
समापन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने कहा कि वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन लघु एवं सीमांत किसानों के लिए अतिरिक्त आय एवं आजीविका सुदृढ़ करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। उन्होंने बकरी पालन को समेकित कृषि प्रणाली से जोड़ने तथा नैनो/माइक्रो होमस्टेड मॉडल जैसी विविधीकृत प्रणालियों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि इन मॉडलों में सीमित भूमि एवं संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए पशुपालन, फसल उत्पादन, फलदार वृक्ष एवं चारा उत्पादन को एक-दूसरे से जोड़ा जा सकता है। डॉ. आशुतोष उपाध्याय ने बकरी पालन में जल प्रबंधन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पशुओं के स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं उत्पादकता के लिए स्वच्छ जल की पर्याप्त उपलब्धता आवश्यक है। उन्होंने किसानों को जल संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग एवं संरक्षण की तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। डॉ. कमल शर्मा ने बकरी पालन के साथ फलदार एवं बहुउद्देशीय वृक्षों तथा हरे चारे के उत्पादन को बढ़ावा देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि खेत की मेड़ एवं उपलब्ध खाली स्थानों का उपयोग वृक्षारोपण के लिए किया जा सकता है, जिससे भविष्य में अतिरिक्त आय के साथ-साथ पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता भी सुनिश्चित होगी।
डॉ. संजीव कुमार ने समेकित कृषि प्रणाली में बकरी पालन की भूमिका पर जानकारी देते हुए बताया कि इसे फसल उत्पादन, बागवानी एवं चारा उत्पादन जैसी गतिविधियों से जोड़कर कृषि संसाधनों का बेहतर उपयोग तथा आय के विविध स्रोत विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उपयुक्त मॉडल अपनाने का सुझाव दिया। डॉ. उज्ज्वल कुमार ने किसानों से प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त व्यावहारिक ज्ञान को अपने खेतों एवं पशुपालन गतिविधियों में लागू करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण की सार्थकता उसके प्रभावी अनुप्रयोग में है।
उन्होंने किसानों से अपने गांव के अन्य किसानों को भी इन तकनीकों के प्रति जागरूक एवं प्रेरित करने की अपील की। कार्यक्रम के दौरान किसानों को वैज्ञानिक बकरी पालन से संबंधित विभिन्न तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी गई तथा उनके प्रश्नों एवं समस्याओं का समाधान किया गया। कार्यक्रम के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. नीति लखानी एवं डॉ. सुरेंद्र कुमार अहिरवाल रहे। पाठ्यक्रम सह-निदेशक डॉ. राकेश कुमार (शस्य विज्ञान) एवं डॉ. काशीनाथ समन्वयक के रूप में डॉ. प्रेम कुमार सुंदरम एवं डॉ. पी.सी. चंद्रन का योगदान रहा। इस अवसर पर क्षमता निर्माण कार्यक्रम के तहत 24 बकरियाँ किसानों को वितरित की गईं।
