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नई दिल्ली : वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2025 में मखाना बोर्ड के गठन की घोषणा किया। यह मखाना उत्पादन को बढ़ावा देने, मूल्य संवर्धन में वृद्धि और बढ़ती वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए विपणन रणनीतियों को सशक्त करके बिहार के मखाना उद्योग में क्रांति लाने के लिए उठाया गया कदम रहा। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड का मंत्रालय, वाणिज्य मंत्रालय केंद्र सरकार में किया गया है। राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र दरभंगा बिहार में स्थापित किया गया है। इसमें उच्च उपज वाली किस्म के लिए मशीनीकृत प्रसंस्करण, टिकाऊ, जल प्रबंधन, निर्यात को बढ़ावा देना और किसान प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित किया गया है। 15 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना पूर्णिया में किया गया है। इसका मुख्यालय भी पूर्णिया में है। बिहार में मुख्य रूप से मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार और सहरसा जिला में मखाना का उत्पादन होता है। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में सबसे अधिक मखाना की खेती होती है। मखाना की नर्सरी फरवरी महीने में लगाई जाती है। उसके बाद मार्च और अप्रैल के बीच में इसकी रोपाई की जाती है और नवंबर में इसकी हार्वेस्टिंग की जाती है। सभी प्रक्रिया में 8 महीने का वक्त लगता है। मखाना के लिए सरकारी योजनाएं यथा- पीएमएफएमई (प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्यम उन्नयन योजना), राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और बिहार की मखाना विकास योजना जैसी कई सरकारी योजनाएं बीज विकास के लिए वित्तीय सहायता और तकनीकी सहायता प्रदान करती है। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड का स्थापना अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के प्रयासों के अंतर्गत भी किया गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विगत मधुबनी दौरा के क्रम में घोषणा किया कि मखाना को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचाना है। बिहार के मखाना को उन्होंने अनमोल धरोहर, स्वाद पोषण और औषधि के रूप में दुनिया भर में प्रसिद्ध बताया हैं। बिहार का मखाना केवल किसानों की आजीविका का आधार ही नहीं है, बल्कि अब वैश्विक पहचान भी बन रहा है। धन्य है बिहार की धरती जहां जल के बीच सोना उपजता है। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में मखाना की खेती चरम पर होती है। मिथिला क्षेत्र भारत में कुल मखाना उत्पादन का लगभग 85% योगदान देता है। यहां के किसान सदियों से मखाना की खेती कर रहे हैं, लेकिन अब इसमें वैज्ञानिक तकनीक का समावेश हो रहा है। पहले तो मखाना की खेती अत्यधिक परिश्रम वाला क़ृषि कार्य रहा है। पहले जलाशयों में बीज डाले जाते हैं। फिर करीब 8 से 9 महीने बाद जब पौधे पर फल आता है तो जलकुंभी जैसी झाड़ियां से इसे निकाला जाता है। इसके बाद होती है सूखने और छीलने की प्रक्रिया। इस पूरी प्रक्रिया के बाद तैयार होता है कुरकुराहट पोषण से भरपूर मखाना। एक दौर ऐसा भी रहा जब किसानों को मखाना बेचने में दिक्कत होती, किन्तु मोदी सरकार की योजनाओं और बाजार की बढ़ती मांग के कारण किसानों को अच्छी कीमत मिलने लगी है। किंतु मखाना का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी निश्चित हो जाए तो किसानों के बीच उमंग और उत्साह भी बढ़ जाएगा। गेहूं और धान की खेती पर आश्रित किसानों को अब मखाना की खेती का नया विकल्प भी मिलने लगा है। अब तो मखाना की प्रोसेसिंग यूनिट भी लगने लगी है, जिससे बिहार के युवाओं को रोजगार भी मिल रहा है। बिहार के दरभंगा, समस्तीपुर, सहरसा, अररिया, कटिहार, मधुबनी सुपौल, पूर्णिया, मुजफ्फरपुर और किशनगंज जैसे जिला में मखाना मंडी काफी विकसित हो रही है। बेंगलुरु समेत कई बड़े शहरों में बिहार का मखाना अपनी धाक जमा चुका है। अमेजॉन और फ्लिपकार्ट जैसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी अब बिहार का मखाना धड़ल्ले से बिक रहा है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2025 को केंद्रीय बजट पेश करते हुए बिहार में मखाना बोर्ड स्थापित करने की घोषणा की, जो सार्थक सिद्ध हुआ। मखाना बोर्ड किसानों को प्रशिक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में सहायता करेगा। इसके अलावा एक जिला एक उत्पाद योजना (ओडीओपी) अंतर्गत भी मखाना को बढ़ावा दिया जा रहा है। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में मखाना को जी आई टैग (जोगरफिकल इंडिकेशन टैग) प्रदान किया गया है। इस कदम से मखाना किसानों के आय बढ़ाने और बिहार के मखाना उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष पहचान मिलेगी। अब मखाना क्लस्टर बनाने की प्रक्रिया चल रही है जहां प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग की व्यवस्था होगी। इससे बिहार का मखाना का सिर्फ पारंपरिक नाम नहीं रहेगा, बल्कि हेल्दी सुपर फूड के रूप में दुनिया भर के बाजारों में भी छाएगा। केंद्र सरकार ने मखाना किसानों की परिश्रम को सोने का फसल बना दिया है, जब कोई मखाना खरीदे तो गर्व से कहे यह केवल एक स्नैक नहीं, बिहार की मिट्टी से उपजा सुपर फूड है। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड मखाना की खेती से जुड़े किसानों को किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) से जोड़ने में सहायक सिद्ध होगा। इससे मखाना से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को औपचारिक बनाने और
इस क्षेत्र को मखानानॉमिक्स के रूप में विकसित करने के लिए सरकार और विभिन्न संस्थाओं द्वारा व्यापक प्रयास कर रही हैं। सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाने में मदद मिलेगी। फॉक्स नट को आमतौर पर मखाना कहा जाता है। यह जलीय पुष्पीय फसल है, जिसका वानस्पतिक नाम यूरील फेरॉक्स है। मखाना को ब्लैक डायमंड या काला हीरा भी कहा जाता है। क्योंकि इसका बाहरी हिस्सा काले रंग का होता है। भारत में सबसे अधिक मखाना उत्पादन बिहार में होता है। बिहार में देश का 90% मखाना उत्पादित होता है। अन्य उत्पादक राज्य पश्चिम बंगाल, मणिपुर, त्रिपुरा, आसाम, जम्मू और कश्मीर, उड़ीसा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश है। हालांकि इसका वाणिज्यिक उत्पादन केवल कुछ राज्य ही करते है। इतना ही नहीं मखाना का उत्पादन अन्य देश नेपाल, बांग्लादेश, चीन जापान, रूस और कोरिया में होता है। वर्तमान में मखाना की प्रसंस्करण के लिए आधुनिक बुनियादी ढांचे और मशीनीकरण की भारी कमी है, जो मखाना उद्योग की सबसे बड़ी चुनौतियों में एक है। मखाना उत्पादन में भारत मुख्यतः बिहार वैश्विक स्तर पर अग्रणी है। लेकिन इसके प्रसंस्करण में अभी भी पारंपरिक तरीके अपनाए जा रहे हैं, जिसके कारण कई समस्याएं उत्पन्न हो रही है। बिहार में फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स की संख्या कम है, इसके कारण किसानों को कच्चा मखाना अक्सर बिहार के बाहर की कंपनियों को कम कीमतों पर बेचना पड़ता है। इससे स्थानीय किसानों को मखाना का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। बाजार में मखाना बेचने के लिए संगठित मार्केटिंग चेन का अभाव है। ज्यादातर किसान बिचौलियों को कम कीमत पर मखाना बेचने को मजबूर हैं। जिससे उन्हें कम मुनाफा मिलता है। मखाना उगाने वाले अधिकतर किसान सरकारी योजनाओं, वित्तीय सहायता और आधुनिक कृषि पद्धतियों के बारे में नहीं जानते हैं। भारत-ब्रिटेन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से मिथिला में खुशी की लहर हुई है और किसानों की बल्ले बल्ले हो गई है। मखाने का निर्यात ड्राई फ्रूट के कोड पर होता था इससे निर्यात की मात्रा का पता नहीं चल पाता था। अब मखाना को विशिष्ट एच एस कोड मिलने से स्वतंत्र रूप से इसका निर्यात हो सकेगा। भारत और ब्रिटेन के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से दरभंगा और मधुबनी के मखाना उत्पादकों एवं कारोबारी को कई तरह के लाभ हुआ है। यहां के मखाना कारोबारी काफी खुश हैं। मखाना की प्रोसेसिंग और आयात निर्यात के कारोबार से जुड़े दरभंगा के कई मखाना व्यवसायी ने कहा है कि भारत और ब्रिटेन के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से आयात निर्यात पर अच्छा असर पड़ेगा। मखाना व्यवसायी ने कहा कि पूर्व के एग्रीमेंट के तहत मखाना पर 12% टैरिफ देय था जो अब मात्र ढाई प्रतिशत हो गया है। टैरिफ कम होने से वहां के खरीदारों को सस्ती दर पर मखाना उपलब्ध होगा। इससे मखाने की मांग बढ़ेगी और निर्यात बढ़ाने पर मिथिला क्षेत्र के उत्पादकों एवं कारोबारी को लाभ होगा। वर्तमान में उत्तर बिहार के उत्पादन और कारोबार से करीब 15 लाख लोग जुड़े हुए हैं। मखाना उत्पादन में सहकारिता विभाग का भूमिका है कि बिहार में मखाना हब मधुबनी और दरभंगा में है। राज्य सरकार ने मधुबनी और दरभंगा सहित प्रमुख जिलों में मखाना उत्पादक सहकारी समितियां का गठन किया है। इन समितियां के माध्यम से किसानों को उन्नत बीज, उत्पादन और विपणन में सहायता मिल रही है, जिसका उद्देश्य मिथिला मखाना के ब्रांड को मजबूत करना और किसानों की आय बढ़ाना है। बिहार में महिलाएं बड़े पैमाने पर कई मखाना कंपनियों की न केवल मालकिन बन रही है, बल्कि इस उद्योग में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रही है। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में मखाने की खेती में महिलाओं का अहम भूमिका है। माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के सहकार से समृद्धि योजना के अंतर्गत सहकारिता विभाग से भी मखाना किसानों को लाभान्वित किया जा रहा है। बिहार सरकार सहकारिता विभाग और कृषि विभाग के माध्यम से मखाना किसानों को केसीसी के साथ-साथ उन्नत बीज और टूल किट पर अनुदान देकर प्रोत्साहित कर रही है। मखाना विकास योजना के तहत किसानों को ₹40000 प्रति हेक्टेयर तक का अनुदान मिल रहा है, जो मखाना उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। किंतु अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर 25% टैरिफ और 10% पेनल्टी लगाने की घोषणा का असर मखाना के निर्यात पर भी पड़ रहा है। भारत में कुल मखाने का करीब 90% उत्पादन बिहार के कोसी सीमांचल और मिथिलांचल के जिलों में होता है। अमेरिका के टैरिफ बढ़ने से यहां के मखाना निर्यातकों की चिंता बढ़ गई है। यह इसलिए भी कि भारत से मखाना के कुल निर्यात में 25% अमेरिका को भेजा जाता है। मखाना व्यवसायियों का कहना है कि अमेरिका की टैरिफ नीति से मखाना निर्यात पर त्वरित प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन पड़ेगा। वैसे भी निर्यातक अन्य देशों में भी विकल्प तलाश रहे हैं। हाल के दिनों में खाड़ी देशों में मखाने का निर्यात सर्वाधिक बढ़ा है। निर्यातक बताते हैं कि डाक निर्यात केंद्र से अगर 1 किलो मखाना अमेरिका भेजने में ₹1000 खर्च आते हैं तो खाड़ी देशों में ₹600 ही लगते हैं। अभी भारत का ब्रिटेन के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौता से ब्रिटेन और यूरोप के अन्य देशों में मखाना निर्यात बढ़ाने में सहायक होगा। पर हमारा भारत सरकार निश्चित रूप से इस दिशा में सार्थक प्रयास करेगी और सहयोग बढ़ाएगी।
इस संबंध में मेरा विचार है कि केंद्र एवं प्रदेश स्तर पर सहकारिता आयोग का गठन होता है तो विभिन्न प्रकार का समीक्षा आयोग द्वारा कर मखाना किसानों को लाभ दिया जाएगा। सहकारिता से समृद्धि योजना के अंतर्गत लाभान्वित करने में जो भी तकनीकी और प्रशासनिक बाधा होगी उसे दूर कर लिया जाएगा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सहकारिता आयोग का गठन आवश्यक है। मखाना बोर्ड का उद्देश्य मखाना के उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और निर्यात को बढ़ावा देना है।

प्रस्तुति : मिहिर कुमार शिकारी
