रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाने की आवश्यकता : डॉ. अनुप दास
पटना : देशव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना ने दिनांक 02 जून, 2026 को पंचायत प्रतिनिधि/सरपंच सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य पंचायत प्रतिनिधियों, वार्ड सदस्यों एवं कृषक समुदाय के बीच समेकित पोषक तत्व प्रबंधन तथा प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाकर मृदा स्वास्थ्य संरक्षण एवं कृषि की सतत उत्पादकता को प्रोत्साहित करना रहा। इस अवसर पर अपने संदेश में संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास, निदेशक ने दीर्घकालीन मृदा उत्पादकता एवं पर्यावरणीय स्थिरता बनाए रखने के लिए संतुलित उर्वरक उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने किसानों से मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों के समुचित संरक्षण को समेकित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने का आह्वान किया तथा बताया कि संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने से समय के साथ मृदा के इन गुणों में सुधार देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड, मृदा के इन सभी गुणों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है।
डॉ. दास ने रासायनिक उर्वरकों (यूरिया, डीएपी) पर अत्यधिक निर्भरता को मृदा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताते हुए कहा कि इससे उत्पादन लागत भी बढ़ती है। उन्होंने किसानों को हरी खाद (ढैंचा), जैविक खाद (गोबर की खाद/कम्पोस्ट), फसल अवशेषों के प्रभावी पुनर्चक्रण, जैव उर्वरकों (एजोला, एजोटोबैक्टर, पीएसबी, राइजोबियम आदि) के उपयोग तथा फसल प्रणाली में दलहनी फसलों को शामिल करने जैसे वैकल्पिक पोषक स्रोतों को अपनाकर रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने की सलाह दी। डॉ. उज्ज्वल कुमार, प्रभागाध्यक्ष, सामाजिक-आर्थिक एवं प्रसार ने ग्रामीण समुदायों तक वैज्ञानिक कृषि तकनीकों के प्रसार में पंचायत प्रतिनिधियों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। डॉ. ए.के. चौधरी, प्रधान वैज्ञानिक ने मृदा उर्वरता बढ़ाने एवं उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में दलहनी फसलों के महत्व की विस्तृत जानकारी दी। वहीं डॉ. अनिर्बान मुखर्जी, वरिष्ठ वैज्ञानिक ने मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संतुलित उर्वरक उपयोग के वैज्ञानिक आधार पर चर्चा की। कार्यक्रम में लगभग 115 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें मखदुमपुर, चिरोरा एवं अगजा पंचायतों के लगभग 40 पंचायत प्रतिनिधि एवं वार्ड सदस्य शामिल रहे । इस अवसर पर मखदुमपुर पंचायत के मुखिया अजय प्रसाद ने कहा कि इस प्रकार के अभियान किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण एवं संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्व को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि जिस प्रकार ‘शिव चर्चा’ ग्रामीण महिलाओं के बीच एक सफल जनआंदोलन के रूप में विकसित हुई है, उसी प्रकार मृदा स्वास्थ्य एवं पोषक तत्व प्रबंधन पर भी गांव स्तर पर नियमित चर्चाओं का आयोजन किया जाना चाहिए, जिससे नवीन कृषि तकनीकों को अपनाने की गति बढ़े। संवाद सत्र में महिला प्रतिभागियों में शर्मिला कुमारी एवं गीता कुमारी ने बताया कि वे पहले से ही प्राकृतिक खेती की विधियों को अपना रही हैं तथा इसके सकारात्मक परिणाम मृदा की गुणवत्ता एवं फसल स्वास्थ्य पर देख रही हैं।
अपने अनुभव साझा करते हुए वार्ड सदस्य विक्रमादित्य उपाध्याय ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों से हरी खाद के रूप में ढैंचा का उपयोग करने के कारण उन्होंने धान की खेती में यूरिया की मात्रा लगभग 50 प्रतिशत तक कम कर दी है, जबकि फसल की उत्पादकता लगभग समान बनी हुई है।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सभी पंचायत प्रतिनिधियों ने मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग तथा सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिए सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों को मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने को प्रेरित करेंगे, जैविक एवं जैविक-आधारित कृषि पद्धतियों के प्रसार में सहयोग देंगे तथा ‘खेत बचाओ अभियान’ के उद्देश्यों को सफल बनाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएंगे। कार्यक्रम ने मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग तथा सतत कृषि के प्रति समुदाय की प्रतिबद्धता को और अधिक सुदृढ़ किया।
