मुजफ्फरपुर: बिहार में कृषि जैव प्रौद्योगिकी को बड़ी मजबूती देते हुए डॉ रीमा कुमारी, सहायक प्राध्यापक-सह-कनिष्ठ वैज्ञानिक, बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयु), सबौर को मखाना पर उनके अभिनव शोध के लिए प्रतिष्ठित एएनआरएफ प्रधानमंत्री प्रारंभिक करियर अनुसंधान अनुदान प्राप्त हुआ है।
उनका शोध मखाना (यूर्यले फेरॉक्स) में कांटों (स्पाइन) के निर्माण के लिए जिम्मेदार जीनों की पहचान एवं उनका विश्लेषण करने पर केंद्रित है। यह एक उच्च मूल्य वाली जलीय फसल है, जिसकी प्रमुख रूप से खेती बिहार में की जाती है। इस परियोजना का उद्देश्य महत्वपूर्ण जीनोमिक संसाधनों का विकास करना है, जिससे मार्कर- असिस्टेंड ब्रीडिंग और आनुवंशिक सुधार को गति मिले तथा स्पाइन-फ्री या कम कांटेदार किस्मों का विकास संभव हो सके।
ऐसे नवाचारों से कटाई प्रक्रिया आसान होगी, श्रम की आवश्यकता कम होगी और मखाना किसानों की आय में वृद्धि होने की संभावना है।
इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए डॉ डी आर सिंह कुलपति, बिहार क़ृषि विश्वविद्यालय(बीएयु) सबौर ने कहा, राष्ट्रीय स्तर पर मिली यह उपलब्धि बीएयु में बढ़ती शोध उत्कृष्टता का प्रमाण है। मखाना जैसी फसलों में नवाचार किसानों की आय बढ़ाने और बिहार को विशिष्ट फसल अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।”
इसी क्रम में डॉ अनील कुमार सिंह अनुसंधान निदेशक, बीएयु सबौर ने कहा कि विश्वविद्यालय मखाना की उत्पादकता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों को बढ़ावा देने में अग्रणी रहा है। उन्होंने कहा कि यह अनुदान अत्याधुनिक जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान को और मजबूत करेगा तथा उन्नत, किसान-हितैषी किस्मों के विकास में सहायक होगा।
विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार, यह परियोजना टिकाऊ फसल सुधार रणनीतियों को बढ़ावा देगी, जिससे बिहार के हजारों मखाना उत्पादक किसानों को लाभ मिलेगा। उल्लेखनीय है कि देश के कुल मखाना उत्पादन का 80% से अधिक हिस्सा बिहार से आता है, ऐसे में इस क्षेत्र में नवाचार राज्य की अर्थव्यवस्था और निर्यात संभावनाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
