बिहार में दलहन उत्पादन बढ़ाने की रणनीतियों पर तीन दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ
पटना : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर पटना में दिनांक 10 मार्च 2026 बुधवार को ‘बिहार में दलहन उत्पादन बढ़ाने की रणनीतियाँ’ विषय पर तीन दिवसीय (10–12 मार्च, 2026) प्रशिक्षण कार्यक्रम का श्रीगणेश हुआ। उपर्युक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम बामेती पटना प्रायोजित है। जिसका उद्देश्य किसानों तथा प्रसार कर्मियों के ज्ञान एवं कौशल का विकास करना है, जिससे बिहार में दलहन उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत तकनीक को अपनाया जा सके। इसके साथ ही कार्यक्रम में वैज्ञानिक फसल प्रबंधन पद्धतियों तथा दलहन की टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया जा रहा है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में बिहार के पाँच जिला पटना, औरंगाबाद, नालंदा, भोजपुर तथा गयाजी से प्रसार कर्मी एवं किसान शामिल हैं। उपर्युक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुल 20 प्रतिभागी में 04 सहायक प्रौद्योगिकी प्रबंधक, 01 प्रखण्ड प्रौद्योगिकी प्रबंधक, 06 किसान सलाहकार तथा 09 प्रगतिशील किसान शामिल हैं।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का श्रीगणेश प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. अरविंद कुमार चौधरी के स्वागत सम्बोधन से हुआ। उन्होंने मुख्य अतिथि डॉ. अनील कुमार सिंह, निदेशक (अनुसंधान), बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर, भागलपुर एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने राज्य में दलहन उत्पादकता बढ़ाने के लिए क्षमता निर्माण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रसार कर्मियों एवं किसानों के ज्ञान और कौशल को सुदृढ़ करना, उन्नत दलहन उत्पादन तकनीक के प्रसार के लिए अत्यावश्यक है। तत्पश्चात प्रतिभागियों का संक्षिप्त परिचय सत्र हुआ, जिससे आपसी संवाद और अनुभवों का आदान-प्रदान किया गया।
डॉ. अनील कुमार सिंह, निदेशक (अनुसंधान), बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर भागलपुर ने कहा कि बिहार में वर्तमान में लगभग 04 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दलहन की खेती की जा रही है तथा गन्ना सहित अन्य फसलों के साथ अंतर्फसली खेती के माध्यम से इसके उत्पादन में वृद्धि की पर्याप्त संभावना हैं। उन्होंने दलहन फसलों में मूल्य संवर्धन के महत्व पर बल दिया तथा किसानों को अपनी आय बढ़ाने के लिए कृषि उद्यमिता को अपनाने का परामर्श दिया।
इस अवसर पर डॉ. आशुतोष उपाध्याय कार्यकारी निदेशक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर पटना ने कहा कि दलहन उत्पादन में वृद्धि को वैज्ञानिक, कृषि तकनीक अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि उन्नत कृषि पद्धति को अपनाने से न केवल उत्पादकता में वृद्धि होंगी बल्कि किसानों की आत्मनिर्भरता भी सशक्त होगी। उन्होंने दलहन उत्पादकता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक यथा कीट प्रबंधन, जल प्रबंधन, गुणवत्तायुक्त बीजों का उपयोग, उर्वरकों का संतुलित प्रयोग तथा उचित फसल प्रबंधन पद्धतियों के महत्व पर प्रकाश डाला। इतना हीं नहीं उन्होंने पोषण प्रबंधन, विपणन व्यवस्था तथा वैज्ञानिक जानकारी की उपलब्धता के महत्व को रेखांकित भी किया। डॉ. उज्ज्वल कुमार, प्रभागाध्यक्ष, सामाजिक-आर्थिक एवं प्रसार ने अपने संबोधन में कहा कि दलहन का सेवन छिलके सहित करना चाहिए, क्योंकि यह पोषण की दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण है। उन्होंने धान–गेहूँ आधारित प्रमुख फसल प्रणाली में दलहन को शामिल करने तथा फसल विविधीकरण में वृद्धि की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने किसान सहभागिता आधारित बीज उत्पादन, कीट प्रबंधन, पोषक तत्व प्रबंधन तथा मल्चिंग जैसी तकनीकों के महत्व पर प्रकाश डाला।
डॉ. कमल शर्मा, प्रभागाध्यक्ष, पशुधन एवं मात्स्यिकी प्रबंधन ने मृदा उर्वरता में दलहन फसलों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दलहन फसलें जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य को सुधारने में सहायक होती हैं। उन्होंने किसानों के बीच दलहन की खेती के लाभ के प्रति जागरुकता बढ़ाने पर जोर दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. कुमारी शुभा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अभिषेक कुमार दुबे ने प्रस्तुत किया।
